Saturday, July 19, 2008

मुद्दा : सामाजिक कलंक बना बाल श्रम


आ॓.पी. सोनिकपिछाले महीने बाल श्रम निषेध दिवस के अवसर पर देश में किसी नई योजना की घोषणा तो नहीं की गई लेकिन महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने यह कहकर ‘बाल श्रम’ की परिभाषा के दायरे पर एक नई बहस शुरू कर दी है कि ‘टीवी धारावाहिकों, रियलिटी शो एवं विज्ञापनों में काम करने वाले बच्चों को भी बाल श्रमिकों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।’ मंत्रालय ने उक्त बच्चों को बाल श्रमिक मानने हेतु दो मुख्य तर्क दिये हैं। पहला, ऐसे बच्चों को काम के बदले पैसा मिलता है। दूसरा, 10-12 घंटे काम करने के कारण बच्चों का शारीरिक एवं शैक्षिक विकास दोनों प्रभावित होते हैं। बच्चों के हित में उठाये गये किसी भी कदम का निश्चित रूप से स्वागत होना चाहिए।मजबूरी में की जाने वाली बाल मजबूरी और अभिभावकों की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए की गयी बाल मजदूरी में बुनियादी अंतर है। गरीबी के कारण दो वक्त का भोजन जुटाने में असमर्थ परिवारों के बच्चे बाल श्रम के रास्ते पर निकल पड़ते हैं। जबकि टीवी कार्यक्रमों में शामिल होने वाले बच्चे आर्थिक अभावों से मुक्त होते हैं। गरीबी की कोख से ही बाल मजदूरी की मजबूरी का जन्म होता है। लेकिन राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष शान्ता सिन्हा का मानना है- ‘देश में बाल मजदूरी का कारण गरीबी नहीं, बल्कि गरीबी का कारण बाल मजदूरी है।’ यानी कि बाल श्रम के मुद्दे में एक और वैचारिक पेच कस दिया गया है। यह किसी विडम्बना से कम नहीं है कि नॉलेज सुपर पावर बनने के प्रयासों में जुटे भारत के करीब सवा करोड़ बच्चे स्कूलों में पढ़ने के बजाय बालश्रम की विवशताओं से जूझ रहे हैं। जिनके पुनर्वास के लिए करीब 4 हजार करोड़ रूपयों की जरूरत पड़ेगी। देश के कुल बाल श्रमिकों में सर्वाधिक आंध्र प्रदेश में- 14.5 प्रतिशत हैं जबकि उप्र में 12.5, मप्र में 12, महाराष्ट्र में 9.5, बिहार में 8.3 और राजस्थान में 9 प्रतिशत बाल श्रमिक हैं। बचपन बचाआ॓ आंदोलन के अनुसार देश में करीब पौने दो करोड़ बाल श्रमिक हैं। देश की राजधानी दिल्ली में ही करीब 50 हजार बाल श्रमिक हैं। अमेरिकी विदेश विभाग की मानव व्यापार संबंधी रिपोर्ट 2008 में खुलासा किया गया है कि भारत में केंद्र सरकार बाल श्रम संबंधी आंकड़ों को छुपाती है। बचपन बचाआ॓ आंदोलन के अध्यक्ष कैलाश सत्यार्थी का मानना भी यही है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाल श्रम मामले में अपनी छवि साफ रखने के प्रयासों में सरकार आंकड़ों को छुपाती है। आखिर कीचड़ पर कालीन बिछाने के प्रयास कब तक होते रहेंगे।पिछले साल अमेरिकी सरकार ने बाल श्रम से संबंधित एक अधिसूचना जारी की थी, जिसमें भारतीय उत्पादों को आयात करने से पहले अमेरिका के बड़े खरीदारों एवं संबंधित अधिकारियों द्वारा भारत की संबंधित फैक्ट्रियों का निरीक्षण कर यह पता लगाने का प्रावधान किया गया कि भारत से आयात होने वाली वस्तुओं के उत्पादन कार्य में बाल श्रम का प्रयोग तो नहीं हो रहा है। देश में परिधान, कालीन, रत्न, आभूषण, खेलकूद के सामान एवं हस्तशिल्प आदि कार्यों में बड़ी संख्या में बाल श्रमिक लगे हुए हैं। तमिलनाडु (शिवकाशी) स्थित माचिस एवं आतिशबाजी उघोग में 50 हजार से अधिक, अन्य राज्यों में चल रहे कालीन उघोग में करीब 1 लाख 50 हजार, जयपुर के रत्न पालिश उघोग में 15 हजार, फिरोजाबाद में कांच उघोग में 50 हजार और मानवाधिकार से संबंधित एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले कपास की खेती कार्य में ही 4 लाख से अधिक बाल श्रमिक कार्य कर रहे हैं।भारतीय अर्थव्यवस्था में बाल श्रम की समस्या बहुत पुरानी है। देश की अर्थव्यवस्था मूलत: ग्रामीण है। ग्रामीण व्यवस्था मूलत: जाति आधारित है और जाति व्यवस्था मूलत: पेशा (व्यवसाय) आधारित है। इस तरह से श्रम की जड़ें सीधे जाति से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि गड़रिया परिवार के बच्चों द्वारा जंगलों में भेड़ चराने, कुम्हार जाति के बच्चों द्वारा मिट्टी के बर्तन बनाने, वाल्मीकि जाति के बज्चों द्वारा सफाई कार्य करने जैसे अनेक जातिगत एवं परंपरागत कार्यो (बाल श्रम) को समाज में स्वाभाविक मान लिया जाता है। यह स्वाभाविकता भी बाल श्रम के सामाजिक कलंक को और भी गहरा कर रही है। विघालयों की दीवारों पर एक आदर्श वाक्य लिखा रहता है कि ‘देश का धन बैंकों में नहीं विघालयों में है’। सर्वशिक्षा अभियान के तमाम दावों के बीच देश में पांच से चौदह वर्ष तक के कुल बच्चों में करीब 65 फीसदी बच्चे ही स्कूल जा पाते हैं और कक्षा दसवीं तक पहुंचते-पहुंचते करीब 60 फीसदी बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। 20 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो न तो स्कूल जाते हैं और न ही कोई काम करते हैं। मिड-डे मील का आकर्षण भी निरंतर कम हो रहा है। जब तक शिक्षा को रोजगारोन्मुखी नहीं बना दिया जाता तब तक न तो पूर्ण साक्षरता का लक्ष्य पाना संभव हो पाएगा और न ही बाल श्रम की समस्या से निजात पाना।

Friday, July 18, 2008

मुद्दा : समलैंगिकता और कानूनी स्वीकृति

29 जून2008 को देश की राजधानी दिल्ली में समलैंगिकों ने पहली बार प्रदर्शन कर अपने सम्बंधों को सामाजिक रूप से कानूनी स्वीकृति देने और धारा 377 खत्म करने की मांग की। इसी तरह का प्रदर्शन कोलकाता और बैंगलुरू में भी किया गया। गौरतलब है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 ‘अप्राकृतिक यौनाचार’ को गैर कानूनी और समलैंगिक को अपराधी घोषित करती है। इसके बावजूद देश में समलैंगिकों की तादाद बढ़ने के पीछे कौन से कारण हैं, उनका खुलासा होना बेहद जरूरी है। मनोचिकित्सक व यौन विशेषज्ञों के अनुसार होमो यानी समलैंगिक पुरूष और लैस्बियन यानी स्त्री समलैंगिक बनने के पीछे यौन सम्बंधी गड़बड़ियां प्रमुख कारण हैं। उन लड़कों में जिनमें लड़कियों के यौन हारमोन एस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्टोन निश्चित मात्रा से ज्यादा होते हैं, उनमें चाल-चलन, बोल-चाल, रहन–सहन व यौनेच्छाओं पर स्त्रीत्व की छाप ज्यादा दिखलायी देती है, वे ही समलैंगिक बनते हैं। उन लड़कियों में जिनमें पुरूषों के यौन हारमोन टेस्टोस्ट्रोन निश्चित मात्रा से ज्यादा पाये जाते हैं, वे लड़कियों के प्रति ज्यादा आकर्षित होती हैं। वे बचपन से ही ऐसी हरकतें करती हैं लेकिन माता-पिता उसे उनकी बाल सुलभ क्रीड़ाएं समझ ध्यान नहीं देते। ऐसी हालत में वे विपरीतलिंगी जैसी हरकतें करती हैं। आगे चलकर वे लैस्बियन बन जाती हैं। इसके अलावा जिन लड़के-लड़कियों के गुप्तांग विकसित नहीं होते, वे हीनभावना से ग्रस्त हो अक्सर समलिंगी से यौन सम्बंध बना लेते हैं। इसके पीछे उनकी मान्यता है कि यदि समय पर उनका शारीरिक व गुप्तांग का विकास नहीं हो पाया, उस स्थिति में विपरीतलिंगी का उनके प्रति न आकर्षण होगा न ही सेक्स के प्रति समर्पण। कुछ लड़के-लड़कियां ऐसी हैं जिनके माता-पिता अक्सर विपरीतलिंगी से बात करने तक की इजाजत नहीं देते और कुछ वे जो 13 साल से पहले ही सेक्स का अनुभव कर लेते हैं, वे समलैंगिकता के शिकार जल्दी हो जाते हैं। फिर धीरे-धीरे वे इसके आदी हो जाते हैं। प्रख्यात मनोचिकित्सक डा. जितेन्द्र नागपाल के अनुसार समलैंगिक पुरूष एक्टिव और पैसिव दो प्रकार के होते हैं। गुंडे, बदमाश, इलाके के दादा या पहलवान टाइप के ताकतवर लड़के एक्टिव कहलाते हैं जिन्हें अपने आतंक या शारीरिक बल के चलते सेक्स के मामले में दूसरे लड़कों को कष्ट पहुंचाने में आनंद मिलता है। पैसिव वे होते हैं जिनमें हर मामले में स्त्रीत्व सीमा से अधिक दिखाई देता है और जिन्हें सेक्स के दौरान दर्द सहने में ज्यादा आनंद मिलता है। एक भी दिन उनके साथ ऐसा न हो तो वे बेचैन हो जाते हैं। मनोचिकित्सक डा. अरूण गुप्ता के अनुसार ऐसे लोग अधिकतर जेल, पागलखाने, अनाथालय या होस्टलों में पाये जाते हैं। ऐसे युवक–युवती अपने ही घर में विपरीतलिंगी से बातचीत तक न करने वाले भय, निराशा और विपरीत सेक्स का अपने प्रति आकर्षण न होने के कारण अपने ही समलिंगी से शारीरिक सम्बंध बना लेते हैं। इस बारे में मनोचिकित्सक व प्रोफेसर डॉ. शेखर सक्सेना कहते हैं कि यह नया नहीं है, और न ही बीमारी है। यह सामाजिक–पारिवारिक हालातों से उपजी एक आदत, डर व हीनभावना है। इस वजह से ऐसे मामले आजकल तेजी से बढ़ रहे हैं।समाज में समलैंगिकों की स्थिति में पिछले डेढ़ दशक से काफी बदलाव आए हंै। अब वे अपनी खुली पहचान चाहते हैं जबकि पहले यह बात सोची भी नहीं जा सकती थी। पिछले आठ सालों में तो 18 से 24 साल के बहुतेरे समलिंगी जोड़े खुलकर सामने आए हैं और बहुतेरे आए–दिन सामने आ भी रहे हैं। अब वे अपने दुत्कार, बहिष्कार या घृणास्पद व्यवहार का पहले की अपेक्षा खुलकर सबके सामने आकर प्रतिकार करने लगे हैं और अपने बुनियादी अधिकारों की विभिन्न मंचों से मांग भी करने लगे हैं। वैसे तो देश में वह 1997 से ही अपने अधिकारों के लिए आंदोलनरत हैं लेकिन वर्ष 2004 में जनवरी माह में मुंबई में ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ के अवसर पर उन्होंने अपनी आवाज बुलंद कर समूचे देश को इस मुद्दे पर यह सोचने पर विवश किया कि अब अधिक दिनों तक उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। भले सरकार यह दलील देकर कि–‘समाज इस तरह के सम्बंधों को कतई मंजूर नहीं करता, इसलिए इसे किसी भी कीमत पर कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती’ उनकी मांग को सिरे से खारिज कर दे। लेकिन यह सर्वविदित है कि समलैंगिकता कोई नई बात नहीं है। उसी वर्ष बैंगलूर में ‘कामुकता, पौरूषता और संस्कृति’ विषय पर संपन्न दक्षिण एशियाई सम्मेलन पर समलैंगिकों की बडे़–बडे़ समूहों में मौजूदगी ने स्पष्ट कर दिया कि पुरूष या स्त्री समलैंगिकता, दोहरे सेक्स सम्बंधों पर व लिंग परिवर्तन करने वालों के बारे में मौन रहने का जमाना अब लद चुका है। इन मुद्दों पर बहस और गोष्ठी किए जाने की जरूरत समय की मांग है। इसे अपवाद मानकर परे नहीं धकेला जा सकता।